
देवास जिले के ग्राम सिया में स्थित नागदा सोसायटी के अंतर्गत सरकारी तुलाई केंद्र इन दिनों किसानों की मुसीबत का बड़ा कारण बना हुआ है। यहां किसान जिस उम्मीद से अपनी फसल की तुलाई करवाने आते हैं, उसी तुलाई के नाम पर उनसे खुलेआम अवैध वसूली की जा रही है। प्रबंधक से लेकर कर्मचारी तक, सब मानो किसी लूट की स्कीम पर तैनात हों और प्रशासन की नज़रों में ये सबकुछ अदृश्य हो।

खुल्लमखुल्ला उगाही – 500 से 1000 रुपए तक की जबरन वसूली
विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, तुलाई केंद्र के प्रबंधक रमेश नागर और उनके सहयोगी कर्मचारी रमेश पटेल किसानों से 500 से 1000 रुपये तक की रकम जबरन वसूलते हैं। किसानों का साफ कहना है कि यदि वे यह रकम नहीं देते, तो उनकी फसल की तुलाई ही नहीं की जाती। यानी सरकारी केंद्र अब ‘भेंट दो, तभी तौल हो’ के मंत्र पर काम कर रहा है। यह शर्मनाक स्थिति तब है, जब सरकार खुद किसानों की आय बढ़ाने और उनकी सुविधा के लिए योजनाएं चला रही है। ऐसे में इस तरह की घटनाएं इन सभी प्रयासों पर पानी फेर देती हैं।
किसानों की लाचारी का बना मज़ाक
ग्राम सिया के किसान बताते हैं कि उनके पास सीमित संसाधन हैं। फसल बेचने की प्रक्रिया पहले ही काफी जटिल और समय लेने वाली होती है, ऊपर से इस प्रकार की जबरन वसूली उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ देती है। कई किसान तो डर के कारण मुंह खोल भी नहीं पाते, क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर शिकायत की, तो कहीं अगली बार तुलाई से ही वंचित न कर दिए जाएं।
किसान नेता रविन्द्र चौधरी पहुंचे मौके पर – किया औचक निरीक्षण
इस पूरे मामले की भनक जैसे ही जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि और किसान नेता रविन्द्र चौधरी को लगी, वे तुरंत ग्राम सिया के तुलाई केंद्र पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने सबसे पहले किसानों से बातचीत की और स्थिति को समझा। किसानों ने साफ-साफ बताया कि जब तक वे पैसे नहीं चुकाते, तब तक तुलाई शुरू नहीं की जाती। कई बार तो पूरे दिन लाइन में लगने के बाद भी बिना पैसा दिए उनकी फसल नहीं तौली जाती। रविन्द्र चौधरी ने इस मामले को गंभीर मानते हुए डीआरसी प्रमोद आनंद को तत्काल फोन पर पूरी जानकारी दी और मांग की कि तुरंत कार्रवाई की जाए। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि अधिकारी को सूचना देने के बावजूद अवैध वसूली में कोई रोक नहीं लगी।
‘सरकारी व्यवस्था पर तमाचा है यह’ – रविन्द्र चौधरी
श्री चौधरी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटना केवल किसानों के साथ अन्याय नहीं, बल्कि पूरी सरकारी व्यवस्था पर करारा तमाचा है। उन्होंने कहा, “किसानों की मेहनत का ऐसा अपमान अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि दोषियों पर त्वरित और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो हम किसानों के साथ सड़कों पर उतरेंगे। जरूरत पड़ी तो हम भूख हड़ताल तक करेंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इस प्रकार की धांधली संभव ही नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने लापरवाह रवैया नहीं बदला, तो जिले भर के किसान एकजुट होकर बड़ा आंदोलन करेंगे।
प्रशासन की चुप्पी पर सवालिया निशान
यह मामला पहला नहीं है। जिले के अन्य तुलाई केंद्रों से भी ऐसी ही शिकायतें लगातार आ रही हैं। लेकिन हर बार प्रशासन केवल ‘जांच की जाएगी’ का रटा-रटाया जवाब देकर चुप हो जाता है। एक ओर तो सरकार किसानों की आमदनी दुगनी करने की बात करती है, दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत यह है कि सरकारी तंत्र ही किसानों को लूटने में लगा है। अगर यही स्थिति रही, तो किसान का विश्वास व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा।
ग्रामीणों में उबाल – सोशल मीडिया पर भी उठा मुद्दा
इस घटना के बाद ग्राम सिया और आसपास के क्षेत्रों में रोष का माहौल है। ग्रामीणों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात उठाना शुरू कर दी है। ट्विटर और फेसबुक पर ‘#किसान_से_लूट’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई लोगों ने वीडियोज और तस्वीरें भी पोस्ट की हैं, जिनमें वसूली के तरीके साफ देखे जा सकते हैं।
जिम्मेदार कौन…? बड़ी मछलियों को बचाने की कोशिश
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर उन “बड़ी मछलियों” को भी पकड़ने का साहस दिखाएगा जो पर्दे के पीछे से इस लूट को संरक्षण दे रही हैं कई किसान नेताओं का कहना है कि तुलाई केंद्र पर पदस्थ कर्मचारी तो केवल मोहरा हैं, असली खेल तो ऊपर से खेला जा रहा है। अधिकारियों की मूक स्वीकृति के बिना ऐसी जबरन वसूली संभव ही नहीं।
कृषि मंडी बोर्ड और सहकारी समिति की भूमिका संदिग्ध
इस मामले में सहकारी समिति की भूमिका भी संदिग्ध हो गई है। जब इतने लंबे समय से ये वसूली चल रही थी, तो समिति ने कोई निगरानी क्यों नहीं की? क्या वह भी इस पूरे मामले में सहभागी है? क्या मंडी बोर्ड को इसकी जानकारी नहीं थी, या उन्होंने जानबूझकर नजरअंदाज किया?
अब आगे क्या कार्रवाई या खानापूर्ति
अब जब मामला उजागर हो चुका है, और मीडिया में भी यह गूंजने लगा है, तो प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है। लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या यह कार्रवाई केवल “कागज़ी” होगी या वास्तव में दोषियों को सजा मिलेगी किसानों की उम्मीदें अब जिला प्रशासन की तरफ टिकी हैं। यदि अब भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो किसानों का आक्रोश व्यापक आंदोलन में बदल सकता है, जिसकी गूंज न केवल जिले में बल्कि पूरे प्रदेश में सुनाई देगी।





