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संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में श्रमिक संपर्क अभियान से जुड़े श्रमिक अमर शहीद बाबू गेनू कोे याद किया 

देवास। भारतीय मजदूर संघ जिला प्रभारी निलेश नागर ने बताया कि अखिल भारतीय मजदूर संघ के आव्हान पर पूरे देश में बीएमएस के स्वर्णिम 70 वर्ष पूर्ण होने पर पंद्रह हजार असंगठित और संगठित क्षेत्र की आयशर कंपनी बाइलोचर यूनिट वन टू वन में श्रमिक संपर्क अभियान में भारतीय मजदूर संघ के जिलाध्यक्ष धनंजय गायकवाड़ दंतोपंत ठेंगडी राष्ट्रीय श्रमिक एवं शिक्षा विकास बोर्ड अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण मारू, विभाग प्रमुख अजय उपाध्याय, कंस्ट्रक्शन मजदूर संघ प्रदेश महामंत्री लोकेश विजयवर्गीय, वरिष्ठ नागरिक परिसंघ केे जिला अध्यक्ष ओमप्रकाश रघंवंशी, भारतीय मजदूर संघ कोषाध्यक्ष माखनसिंह धाकड़, जिला मंत्री अमित पांडे, पवन निगम, सुरेन्द्र मिश्रा, जोगेन्द्रसिंह चौहान, किशोरीलाल शर्मा, सुनील पटेल, कमलेश चौधरी सन्नौड, अशोक देवड़ा, विनित उपाध्याय, विष्णु पटेल, आशाराम मालवीय, निर्भयसिंह आदि उपस्थित थे। इस अवसर पर श्री गाकवाड़ ने कहा कि श्रमिक संपर्क अभियान एक जन अभियान बन चुका है क्योंकि श्रमिक का जो शोषण हो रहा है वह वाकइ गलत है उसके लिये आमजन आंदोलन की आवश्यकता है। इस अभियान में 25 हजार श्रमिक जुड़ चुके हैं। श्री मारू ने आयशर गेट पर श्रमिकों को सम्बोधित करते हुए बताया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय और सरदार पटेल जैसे महानायकों का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन इस संग्राम के कई गुमनाम पैदल सैनिक भी थे, जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की चाहत के, अपने जीवन का बलिदान दिया। इन्हीं में से एक थे मुंबई के एक सूती मिल मजदूर, बाबू गेनू सैद। आज उनकी 91वीं पुण्यतिथि है। बाबू गेनू का जन्म 1 जनवरी 1908 को पुणे के महांनगुले गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा केवल चौथी कक्षा तक प्राप्त करने के बाद, उनका बचपन आर्थिक तंगी और संघर्ष में बीता। पिता की असमय मृत्यु के बाद, परिवार का बोझ उनकी मां पर आ गया। बालक बाबू ने मिल मजदूर बनकर अपनी मां का सहारा बनने की ठानी।महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित बाबू गेनू ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 12 दिसंबर 1930 को, उन्होंने मुंबई की सड़कों पर विदेशी कपड़ों के ट्रक को रोकने का प्रयास किया। ब्रिटिश पुलिस के आदेश पर ट्रक चालक ने ट्रक को उनके ऊपर से नहीं चलाने की हिम्मत दिखाई, लेकिन एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी ने ट्रक की कमान संभालते हुए बाबू गेनू को कुचलकर उनकी शहादत ले ली।उनकी इस बलिदानी घटना ने स्वदेशी आंदोलन को नई ऊर्जा दी। आज भी मुंबई की गेनू स्ट्रीट और महांनगुले गांव में उनकी मूर्ति, उनके बलिदान की गाथा सुनाती है। कस्तूरबा गांधी ने उनके घर जाकर उनकी मां को सांत्वना दी और उनके वीर पुत्र की प्रशंसा की। बाबू गेनू सैद, एक साधारण मजदूर होते हुए भी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के असाधारण नायक बन गए। उनका बलिदान हमें सिखाता है कि सच्चे नायक वही हैं, जो अपनी मातृभूमि के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। आभार माखन सिंह धाकड़ ने माना। 

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