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समाचार लाईन की खबर के बाद शायरों के नाम हटे! भाजपा की परिषद में मोदी विरोधी शायरों को न्योता, विवाद बढ़ा तो आयोजन से नाम हटे! महापौर, सभापति और मेला समिति की भूमिका पर उठे सवाल, चयन की जिम्मेदारी लेने के बजाय एक-दूसरे पर टालते नजर आए जिम्मेदार; आखिर किसकी पसंद पर हुआ था विवादित शायरों का चयन…?

देवास। भाजपा की परिषद, भाजपा के महापौर, भाजपा के विधायक और सांसद, प्रदेश में भी भाजपा की सरकार… इसके बावजूद नगर निगम के मुशायरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के आरोपों से जुड़े शायरों को आमंत्रित किए जाने का मामला अब सियासी तूल पकडऩे लगा है। 31 अक्टूबर को होने वाले मुशायरे के लिए अरिफ ोफी हैदारबाद, सतलज राहत इंदौर सहित एक अन्य शायह को अब नही बुलाया जा रहा है। इ सवाल यह उठता है कि इन शायरों को न्योता दिए जाने की जानकारी सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि आखिर उनका चयन किसके कहने पर और किन आधारों पर किया गया? मामले ने तब और तूल पकड़ा जब सोशल मीडिया पर विवाद बढऩे के बाद नगर निगम की ओर से संबंधित शायरों को नहीं बुलाए जाने की बात सामने आई। यानी विवाद बढऩे के बाद चयन पर पुनर्विचार करना पड़ा। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नगर निगम में मेला समिति गठित है और महापौर, सभापति सहित समिति के जिम्मेदार सदस्य भाजपा से जुड़े हैं, तो शायरों के चयन के दौरान उनके पुराने विवादित बयानों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
चयन किसने किया, जिम्मेदारी कौन लेगा?
शायरों को आमंत्रित करने के फैसले को लेकर जब महापौर, मेला समिति और अन्य जिम्मेदारों से सवाल किए गए तो चयन की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से किसी एक के हिस्से आती नजर नहीं आई। जिम्मेदार एक-दूसरे की ओर बात टालते दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आयोजन समिति ने आमंत्रित शायरों की पृष्ठभूमि और उनके पुराने बयानों की जानकारी जुटाई थी? यदि जानकारी थी तो उन्हें न्योता क्यों दिया गया और यदि जानकारी नहीं थी तो चयन प्रक्रिया की निगरानी किसके जिम्मे थी?
साहित्य का मंच या सियासी असहजता?
नगर निगम के सांस्कृतिक आयोजनों का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति और अदब को बढ़ावा देना होता है। लेकिन मुशायरे के लिए विवादों से जुड़े नामों का चयन होने से आयोजन की चर्चा साहित्य के बजाय राजनीतिक सवालों में उलझ गई। भाजपा एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और विचारधारा को लेकर मुखर रहती है, वहीं दूसरी ओर भाजपा शासित नगर निगम के आयोजन में मोदी विरोधी कथित बयानों से जुड़े शायरों को न्योता दिए जाने से पार्टी के स्थानीय नेतृत्व की असहजता बढऩा स्वाभाविक है।
भाजपा जिलाध्यक्ष से भी सवाल
अब सवाल भाजपा जिला संगठन पर भी है कि क्या इस पूरे मामले में चयन प्रक्रिया को लेकर जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाएगा? क्या मेला समिति की भूमिका की समीक्षा होगी या विवाद को शायरों के नाम हटाने तक ही सीमित कर दिया जाएगा? फिलहाल संबंधित शायरों के शुक्रवार को होने वाले मुशायरे में शामिल नहीं होने की बात सामने आई है। लेकिन विवाद ने नगर निगम के आयोजन प्रबंधन और चयन प्रक्रिया पर सवालिया निशान जरूर लगा दिए हैं।

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