मीसाबंदी सेनानी गोविंद नारायण करमरकर को गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम विदाई, बेटियों ने दी मुखाग्नि, आपातकाल में 19 माह रीवा जेल में रहे थे बंद, लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने वाले सेनानी को नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई

देवास। लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल के दौरान 19 माह तक जेल की यातनाएं सहने वाले मीसाबंदी सेनानी एवं सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद नारायण करमरकर मंगलवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। उनकी अंतिम यात्रा में शहर के सामाजिक, धार्मिक एवं विभिन्न संगठनों से जुड़े लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। शासन की ओर से उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देकर सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दी गई। वहीं, उनकी दोनों पुत्रियों ने मुखाग्नि देकर अपने पिता को अंतिम विदाई दी। यह भावुक दृश्य अंतिम यात्रा में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर गया।

मूलतः रीवा निवासी श्री करमरकर वर्ष 2015 में सेवानिवृत्ति के बाद देवास आकर बस गए थे। कम समय में ही उन्होंने अपनी सादगी, मिलनसार स्वभाव और सामाजिक सक्रियता से शहर में विशेष पहचान बनाई। वे महाराष्ट्र समाज, श्री रामदास विचार मंच सहित अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहे और हर सामाजिक कार्य में सक्रिय भागीदारी निभाते थे। समाजसेवा के लिए लोगों को प्रेरित करना उनकी पहचान बन गया था। वर्ष 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में उन्हें मीसाबंदी के रूप में रीवा जेल में 19 माह तक कारावास भुगतना पड़ा था। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा और संघर्ष को देखते हुए शासन ने उनके अंतिम संस्कार के अवसर पर गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान कर सम्मान व्यक्त किया।
अंतिम यात्रा में शहर के अनेक गणमान्य नागरिक, सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, मित्र और शुभचिंतक उपस्थित रहे। पूरे वातावरण में शोक और श्रद्धा का भाव दिखाई दिया। जब उनकी दोनों पुत्रियों ने पिता की चिता को मुखाग्नि दी तो उपस्थित लोगों ने इसे बदलते समाज की सकारात्मक सोच और बेटियों द्वारा अपने पिता के प्रति सर्वोच्च कर्तव्य निभाने का भावुक क्षण माना। श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित लोगों ने श्री करमरकर के सामाजिक योगदान और लोकतंत्र के लिए किए गए संघर्ष को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।





